रविवार, 21 दिसंबर 2014

महंगाई पर मजबूत पकड़



व्यंग्य

महंगाई पर मजबूत पकड़

हमने अपने किराना वाले से कहा-क्यों भई रामरतनजी, आप खाने-पीने की चीजों के दाम क्यों नहीं घटा रहे जबकि सरकार बराबर यह दावा कर रही है कि महंगाई दिनों दिन कम हो रही है।अच्छे दिन आ गए हैं, परंतु हमें तो ऐसा कहीं से भी नहीं लग रहा। वह बोला- आप भी साहब यह कैसी बातें कर रहे हो। महंगाई कहां कम हुई, आप इनके बयानों पर मत जाओ।हमने तर्क दिया कि पेट्रोल और डीजल के दाम तो काफी घट गए हैं इन छ्ह महीनों में, हमने अखबार में पढ़ा है कि कच्चे तेल की कीमतों में 37 प्रतिशत और पेट्रोल डीजल के दाम 8 से 11 प्रतिशत घटे हैं।इनकी वजह से ही आम जरूरतों के दाम घटते-बढ़ते हैं। वह अड़ गया कि आप कुछ समझते नहीं कि दाम घटे तो सरकार ने उत्पाद शुल्क बढ़ाकर सब बराबर कर दिया तो महंगाई वहीं की वहीं रही ना।
रामरतनजी ने आगे खोलकर बताया- देखिये साहब, अगर आप हमारा दिमाग और नहीं चाटने की गारंटी दें तो मैं कुछ कहूं। हमने कहा- चलिये आप बताओ, हम कुछ नहीं बोलेंगे। इस शर्त पर किराने वाले ने बताया-सरकार ने देखा कि तेल के दाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इन छ्ह महीनों में 105 डालर से घटकर 65 डालर प्रति बेरल पर आ गए तो जनता को दिखाने के लिए घटी कीमतों के मुक़ाबले रुपये में चार आने घटा दिये। तेल कंपनियों का फायदा तो यूं का यूं रहा। जनता को मिला बाबाजी का ठुल्लू।
हमने जानना चाहा, हमें तो यह बताओ भाई कि महंगाई कब घटेगी? रामरतन उकता गया। साहब, भारत महान देश है। यहां महंगाई एक बार बढ़ गई तो बढ़ गई । व्यापारी उसे मजबूती से पकड़कर रखते हैं, ताकि पीछे की ओर नहीं लौटे। जैसे-जैसे देश के कदम आगे बढ़ते जाते हैं वैसे ही महंगाई भी बढ़ती है और पीछे नहीं आ सकती।हम रण छोड़ थोड़े ही हैं।इसलिए बाबूजी, यह भूल जाओ कि एकबार दाम बढ़ गए तो कभी कम होंगे। दाम नहीं बढ़ रहे इसी का शुक्र मनाओ। और अच्छे दिन किसे कहते हैं।हमारे लिए तो अच्छे दिन ही हैं। आप तो दो काम करो, अपनी कमाई बढ़ाओ और शॉपिंग बढ़ाओ, अच्छे दिन अपने आप आ जाएंगे। महंगाई को लेकर अगर यूं ही हमसे उलझते रहे तो आपको कभी अच्छे दिन नसीब नहीं होंगे, हमारी बात समझे कि नहीं ? हमने उसके आगे हारकर हां में अपनी मुंडी हिलाई और मंडी की राह पकड़ी।
 -फारूक आफरीदी   

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

विनोद वार्ता

भाग्य भरोसे बैठे हैं कभी तो लहर आएगी

       हम बचपन से पचपन तक पहुँच गए लेकिन आज तक यही सुनते आए हैं कि जैसा कर्म करोगे वैसा फल देगा भगवान। लेकिन,यह कहावत हमारे गले कभी नहीं उतरी। हमें भगवान पर तो पूरा भरोसा है,किन्तु यह मानने में थोड़ा एतराज है कि कर्म से ही सब कुछ संभव है। जब कोई इस बात की गारंटी देने वाला नहीं कि अच्छे कर्म के अच्छे नतीजे ही निकलेंगे,तो फिर भाग्य पर भरोसा करने में हर्ज क्या है ! भाग्य भरोसे बैठने के पीछे हमारे पास कुछ ठोस तर्क हैं। आप ही बताइये कि भुजंग, मूसक, चींटी या गजराज, कपि, कपोत या गोरैया, साधु, सन्त, फकीर अथवा मुसाफिर कहीं कमाने जाता है क्या? नहीं ना, लेकिन पेट तो सब भरते हैं। इस प्रकार कर्म तो प्रधान नहीं रहा ना। हर जीव भगवान की माया है। हमारी काया भी उसी की माया है। हमारे जैसे लाखों लोग भगवान भरोसे चैन की सांस ले रहे हैं ।
       यह अलग बात है कि हम जैसे कुछ लोग सामाजिक दबाव या बंधन में घर गृहस्थी की गाड़ी खींचने के लिए मजदूरी अथवा सेवा-चाकरी करते हैं।अंततः देता तो भगवान ही है।अगर हम कुँवारे होते तो काहे को नौकरी करते भाई। हम भी सैंकड़ों लोगों की तरह जीवन भर लंगरखाने में लंगर डाले रहते। ये तो शादी करके बुरी तरह फंस गए और लाख झंझट मोल ले लिए । अब ना तो निगलते बनता है ना उगलते। अब अपना तो छोड़ो,लेकिन बेगम–बच्चों के कुछ अरमानों का ख्याल तो रखना ही पड़ता है ना। मसलन बंगला,कार, तीन रात और दो दिन तक पंच सितारा होटल में बिताने का आनंद, मुंबई, चेन्नई, शिमला, गुलबर्ग, कश्मीर, सिंगापुर, दुबई, स्विट्जरलैंड, न्यूयार्क और टोकियो जैसे पर्यटन स्थलों की हवाई यात्रा जैसे छोटे-मोटे अरमानों का गला तो नहीं घोंट सकते ना। स्विस बैंक में खाता खोलने का अरमान तो पाल नहीं रहे हैं जो किसी को एतराज हो।
इतने छोटे अरमानों को पूरा करने के लिए भी अगर हम कर्म करने लगे तो फिर भगवान की भूमिका क्या रह जाएगी ! इसलिए हम तो हंड्रेड परसेंट भगवान के भरोसे बैठे हुए हैं और बैठे रहेंगे।कर्म करके क्यों फिजूल में अपने शरीर का नाश करें। आजकल खुले बाजार का दौर है। यानी कि खुला खेल फर्रूखाबादी। लाटरी,शेयर,डिबेंचर और ना जाने क्या–क्या।नेटवर्क और सोशियल मीडिया पर लोग आए दिन लाटरी और सवाल-जवाब में ही लाखों डालर कमा रहे हैं। हमने कार और बंगला सहित बेगम साहिबा के सारे सपने एक झटके में पूरे करने के लिए महालक्ष्मी भाग्य पुरुष्कार योजना का एक टिकट ले लिया है। पहला पुरुष्कार ही एक करोड़ का है। भाई लोग कर्म पर विश्वास करें तो करें, हमें तो अपने भाग्य पर पूरा भरोसा है ।
हमने पुरुष्कार योजना के टिकट का नंबर अपनी डायरी में ठीक से दर्ज कर अपने पर्स के एक सुरक्षित कोने में सौ रुपए के नोट में तह करके रख लिया। इस बीच हम और हमारी बेगम साहिबा यही प्लान बनाने में व्यस्त रहे कि एक करोड़ रुपये आते ही हमारी प्राथमिकताए क्या रहेंगी! हर रोज इस विषय पर दिमाग के घोड़े दौड़ाए जाते रहे लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाते।अपने दफ्तर वालों से भी राय-मशविरा करते रहे लेकिन किसी ने करोड़ रुपये देखे ही नहीं तो बेचारे क्या खाकर सलाह देते।एक रामबाबू थे जो हमें कहते कि अपने भाग्य को प्रबल बनाओ।दान-पुण्य करो।हमने उनकी सलाह गांठ से बांधकर जो भी गरीब-बेसहारा नजर आया,उसकी श्रद्धानुसार सेवा की। यहाँ तक कि अनाथ आश्रम जाकर दान-पुण्य कर आए।इससे हमरे भीतर प्रबल भाग्यशाली होने का विश्वास जगा।
       एक दिन हमारी बेगम ने रुष्ठ होकर उलाहना दिया कि आप बहुत दिनों से हमें टाल रहे हो। आप सीरियसली कोई प्लानिंग क्यों नहीं करते कि एक करोड़ रुपए खर्च कैसे करेंगे।वह अड़ियल बैल की तरह अड़ गई और बोली-आज ही फैसला करो वरना एकदम इतने रुपये आ गए तो हम जल्दी में कुछ नहीं कर पाएंगे। मुझे लगता है तुम उन्हें यूं ही उड़ा दोगे। इस तरह तो हमारे अरमान आंसुओं में ही बह जाएंगे।
        हमने उन्हें उन्हें ना केवल ढाढ़स बँधाया बल्कि उसी समय प्लानिंग करने बैठ गए। बेगम साहिबा मारे खुशी के फटाफट गरमागरम पकोड़े, खीर ,मालपूए, आइसक्रीम और कोल्ड काफी बना लाई।यूं अन्य दिनों में जब कभी हम इस तरह की फरमाइश करते तो उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंगती, लेकिन आज बिना मांगे ही सब कुछ हाजिर देख हमारी हंसी फूट पड़ी। इस पर बेगम के तेवर तन गए- क्यों जी, किस बात की हंसी फूट रही है ? जानते थे कि यदि सच कहा तो महाभारत छिड़ जाएगा। हमने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी।हमने कहा कि बेगम आप इतनी अच्छी डिश बना लेती हो तो पंचतारा होटल जाने की क्या जरूरत है।वह पलटकर बोली-आप तो कभी कभी बिलकुल कंगलों जैसी बातें करते हो, पंचतारा होटल के मजे आप क्या जानो, गेटमैन से लेकर बेरे तक आते –जाते सिर झुकाते हैं, जिससे हमें रईस होने का गुमान होता है।
       बेगम ने पूछा- तो, सबसे पहले यह बताओ कि पंचतारा होटल में ताज होटल चलेंगे कि ह्यात रीजेन्सी जाना पसंद करेंगे। हमने सुझाव दिया कि जब विदेश चलेंगे तो वहीं किसी नामी होटल में रह लेंगे। बेगम ने ना-नुकर करते हुए हमारी बात मान ली। हमने कहा आगे बताओ। वह बोली- कार कौन सी खरीदेंगे? हमने कहा- मारूती-800 ठीक रहेगी। मेंटीनेंस कम मांगती है। बेगम ने नाक-भौ सिकोड़े और बोली- घटिया सोच से जरा ऊपर उठो। हम तो सचिन तेंदुलकर जैसी फ़रारी या बीएमडब्लू खरीदेंगे। मैंने कहा– बेगम,पुरुष्कार एक करोड़ का है,10 करोड़ का नहीं। बेगम का मुंह लाल-पीला हो गया। तुमसे तो बात करना ही फिजूल है।छोड़ो तुम कुछ नहीं खरीद सकते, जो जंचे वह करना। अच्छा यह बताओ कि सबसे पहले हम सिंगापुर जाएंगे या दुबई? हमने कहा- पैसे मिलते ही जहां कहोगी वहाँ के टिकट बुक करा देंगे। बेगम अड़ गयी और बोली – नहीं, आप आज ही ई-टिकट करवा लो,क्योंकि मुझे तुम पर विश्वास नहीं।  हो सकता है कल को तुम बदल जाओ। हमने कहा कि ठीक है,आपकी बात मान लेते हैं, आप तीन लाख मेरे खाते में जमा करवा दो ताकि ई-पेमेंट क्लियर हो सके। बेगम साहिबा के होश उड़ गए। कहने लगी- फिर तो रहने दो,जब एक करोड़ मिले तब करा देना। हमने तय किया कि पहले पुरुष्कार राशि मिल जाए उसके बाद सारी प्लानिंग एक साथ कर लेंगे।
       आखिर पुरुष्कार का ड्रा खुलने का दिन आ गया। हम अपनी डायरी खोल अखबार में अपने टिकट का नंबर टटोलने लगे। देखते क्या हैं कि हमारे टिकट पर ही पहले पुरुष्कार यानी एक करोड़ का ड्रा खुला है।मैं और बेगम इस पर बल्लियों उछलने लगे। हमारी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। बेगम कहने लगी- देखो जी, मुझसे रहा नहीं जा रहा, मैं सारे मुहल्ले को झटपट ये खुश-खबरी देकर आती हूँ तब तक मिठाई ले आओ, सबका मुंह मीठा कराते हैं। मैंने बेगम से कहा- थोड़ा धीरज धरो,पहले पुरुष्कार राशि ले आते हैं। लौटते वक्त सबका मुंह मीठा करा देंगे।
       बेगम कहने लगी-जल्दी से टिकट निकालो, हम दोनों चलते हैं। मैंने अपना पर्स टटोला तो यह देख कर अवाक रह गया कि उसमें टिकट नदारद था।मेरे होश उड़ गए। जैसे पैरों के नीचे से धरती खिसक गयी।मेरे चेहरे का रंग उड़ता देख बेगम झल्ला उठी कि अब क्या हो गया ? मैंने संयम बरतते हुए कहा- चिंता मत करो, टिकट अभी अपने आफिस जाकर ढूँढता हूं ,शायद गलती से वहाँ रह गया हो। बेगम का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया और बोली- मेरे पास रखवा देते तो आज यह नौबत नहीं आती, लेकिन मुझ पर कभी विश्वास ही नहीं किया।अब यहाँ मुंह लटकाए खड़े रहने से कुछ नहीं होगा,जाकर देखो। मैं वहाँ से तुरंत खिसक लिया और आफिस जाकर तमाम कागजों और आलमारी को उथल-पुथल कर दिया। टिकट को ना मिलना था सो नहीं मिला। आखिर घर लौटकर आपसी मशविरे के बाद हम ड्रा खोलने वालों से मिलने के लिए रवाना हो गए।
       वहाँ हम क्या देखते हैं कि अनाथ आश्रम के बच्चों की टोली बैठी हुई है।एक बच्चे के हाथ में टिकट है। हमें देखते ही वे मारे खुशी के दौड़ते हुए हमारे पैर छूने लगे। आश्रम के संचालक ने हमें फूलमालाएँ पहनाई और कहने लगे कि पैसे लेकर आपका आभार जताने के लिए हम सब आपके ही पास आ रहे थे लेकिन आपने तो यहीं दर्शन देकर हमें उपकृत कर दिया। आपने कुछ दिन पहले बच्चों को सौ रुपये के साथ जो टिकट दान में दिया था वह खुल गया। भगवान आपका भला करे, बच्चों का तो भाग्य ही खुल गया । ये अनाथ बच्चे आपको जिंदगी भर दुआएं देंगे। इस राशि से इन अनाथ बच्चों के जीवन में एक नई रोशनी आएगी ।
       यह सुनकर बेगम अपने अरमान ठंडे होते देख एक क्षण के लिए गम में डूब गई लेकिन अगले ही क्षण उसने अनुभव किया कि जो कुछ हुआ,शायद अच्छा हुआ। अनाथ बच्चों के चेहरों पर असीम खुशी देखकर उसका दिल भर आया। मन में खयाल आया हम इनके काम आ सके,इससे बड़ी कोई खुशी हो नहीं सकती। हम तो अपने परिश्रम से भी खुशियाँ हासिल कर लेंगे लेकिन ये बच्चे तो यही सोचते होंगे कि भाग्य भरोसे बैठे हैं कभी तो लहर आएगी।जब लहर आ गयी है तो हमें इनकी ठंडक अपने भीतर भी महसूस करनी चाहिए।उन्होने बच्चों को गले लगा लिया।  
-फारूक आफरीदी, बी-70,प्रगति पथ, बजाज नगर,जयपुर-302015

मो. 94143 35772

बुधवार, 3 दिसंबर 2014

सपने साकार करने का युग



व्यंग्य

सपने साकार करने का युग

इंसान जब से पैदा हुआ तब से सपने देखता आया है, जैसे सपने देखना उसका जन्मसिद्ध अधिकार हो। हमें पता नहीं कि इंसान ने अपने तईं सपने देखने का अधिकार कब से छोड़ दिया और कब से दूसरों के सपने साकार करना शुरू कर दिया। हो सकता है लोग राजा-महाराजाओं और बादशाहों के जमाने में भी अपने सपनों की बजाय उनके सपने साकार करते रहे होंगे।  
आज हम लोकतन्त्र के युग में जी रहे हैं। सपने अभी भी देख रहे हैं। आम आदमी अपने सपने साकार करने के लिए दिन-रात यानी यूं कहें कि जिंदगी भर खटते रहते हैं लेकिन सपने हैं कि साकार होने का नाम ही नहीं लेते। दूसरी ओर हमारे लोकतन्त्र के प्रहरी अपने या आमजन के सपने साकार करने की बजाय अपने नेताजी के सपने साकार करने में लगे हैं।
इधर मंत्री पद की शपथ ली और उधर उनका नेताजी के सपने साकार करने का अभियान उछाले मारने लगता है। वे देश-प्रदेश की निष्ठापूर्वक सेवा की शपथ लेकर सीढ़ियाँ उतरते ही उनकी बाट जोह रही मीडिया टीम के सामने अपने और अपनी जनता के सारे सपनों को साकार करने का संकल्प भुलाकर विशुद्ध रूप से अपने महान नेताजी का सपना पूरा करने के लिए कमर कसते दिखाई पड़ते हैं, भले ही उनके नेताजी ने उन्हें बताया भी ना हो कि उनका सपना क्या है। है ना अजीब बात! इस चक्कर में यह भी तो हो सकता है कि उनके नेताजी का सपना कुछ और हो और वे कुछ दूसरा सपना ही साकार कर रहे हों।
यह भी संभव है कि हमारे लोकतन्त्र के प्रहरी अपने नेताजी के सपनों की बजाय अपने और अपने परिवार, रिश्ते-नातेदारों के वे सपने साकार कर रहे हों, जो वर्षों से देख रहे हों। हमारे अनुमान गलत साबित हो सकते और सही भी । असल में उनके सपनों के साकार रूप का पता तो तभी चल पाता है जब वे सपनों की नई पोटली के साथ फिर से लंबे-लंबे हाथ जोड़ते दिखाई पड़ते हैं। -फारूक आफरीदी

@रचना मौलिक और अप्रकाशित है।

फारूक आफरीदी, बी-70, फ़र्स्ट फ्लोर,प्रगति पथ, बजाज नगर,जयपुर-302015 email : faindia2015@gmail.com मो. 94143 35772

भाड़ में जाए विकास दर



व्यंग्य

भाड़ में जाए विकास दर

हमने सरकार को हमेशा देश की गिरती विकास दर की चिंता में डूबे देखा है। पता नहीं इस चिंता में कितनी सच्चाई है, क्योंकि हमने सरकार के पेट में तो घुसकर कभी देखा नहीं। ये सब हाथी के दांत की तरह दिखावा मात्र हो। वैसे यह चिंता करना लोकतन्त्र की जिम्मेदार सरकार होने के नाते अपना फर्ज़ समझती है। यूं सरकार के इतने फर्ज बनते हैं कि अगर उनकी सूची बनानी पड़े तो अलग से एक मंत्रालय और मंत्री बनाकर किसी विस्थापित नेता को स्थापित किया जा सकता है। बहरहाल, वर्तमान मुद्दा है विकास दर को सुधारना और हमें भरोसा है सरकार इसे सुधार कर ही दम लेगी।
विकास दर को लेकर सरकार जो भी सोचे, सोचती रहे, लेकिन हमारे देश के लोग कुछ और ही सोचते हैं।सभी यही सोचते हैं कि देश बनता है व्यक्ति से और व्यक्तियों से, इसलिए सबसे पहले व्यक्ति का विकास होना चाहिए। सरकार अच्छी तरह जानती है कि ऊंचे ऊंचे पदों पर बैठे मंत्री से लेकर अफसर तक और यहां तक कि निचले स्तर पर संतरी तक व्यक्ति अपने-अपने विकास में मुस्तैदी से जुटे हुए हैं। देश का मीडिया अगर जागरूक ना होता तो यह पता ही नहीं चल पाता कि कौन कितना तेजी से अपनी विकास दर को मजबूत बना रहा है।
हमारे मंत्री टू-जी, स्पेक्ट्रम,संचार,खेल,कोयला,रक्षा मामले में कारनामे दिखाकर अपनी विकास दर बढ़ा लेते हैं।हमारे खिलाड़ी मैच फिक्सिंग से अपनी विकास दर को मजबूत बना लेते हैं। ऐसे में हमारे अफसर क्यों पीछे रहें! एक अफसर जिसका मासिक वेतन इतना होता है कि घर-गृहस्थी,बच्चों की पढ़ाई,सफ़ेद कालर की धुलाई का खर्च आसानी से चल जाए किन्तु देखते ही देखते करोड़ों-अरबों में खेलने लगता है।पद चाहे इंजीनियर,वन अधिकारी, पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी आदि कुछ भी हो सकता है। जनता के विकास की ज़िम्मेदारी निभातेनिभाते वे अपने विकास की चिंता में इतने  डूब जाते हैं कि उनकी  विकास दर सौ गुना, हजार गुना,दस हजार गुना बढ़ा जाती है और सरकार की विकास दर का कांटा 5 से 6 प्रतिशत पर आकर अटक जाता है। देश खूब अच्छी तरह जानता है कि हमारे कई महान संतगण भी इस विकास कला में इतना आगे बढ़ गए हैं कि सेंसेक्स की उछाल भी बेचारी शर्म से जमीन में गड़ी जाती है।
इसलिए हम तो कहते हैं भाड़ में जाए देश की विकास दर । सरकार को तो विकास दर की चिंता बिलकुल छोड़ देनी चाहिए,क्योंकि आज तक जो भी सरकारें रहीं वे भी देश की विकास दर नहीं सुधार सकीं तो इस दु:ख में दुबले होने का क्या मतलब क्या है।व्यक्ति की विकास दर सुधरेगी तो समूहों की भी सुधरेगी और इस तरह एक दिन पूरे देश की विकास दर अपने-आप सुधर जाएगी।हम सुधरेंगे तो देश अपने आप सुधर जाएगा ना। -फारूक आफरीदी 
 @रचना मौलिक और अप्रकाशित है।

फारूक आफरीदी, बी-70,फ़र्स्ट फ्लोर,प्रगति पथ, बजाज नगर, जयपुर-302015
email : faindia2015@gmail.com मो. 094143 35772