बुधवार, 3 दिसंबर 2014

भाड़ में जाए विकास दर



व्यंग्य

भाड़ में जाए विकास दर

हमने सरकार को हमेशा देश की गिरती विकास दर की चिंता में डूबे देखा है। पता नहीं इस चिंता में कितनी सच्चाई है, क्योंकि हमने सरकार के पेट में तो घुसकर कभी देखा नहीं। ये सब हाथी के दांत की तरह दिखावा मात्र हो। वैसे यह चिंता करना लोकतन्त्र की जिम्मेदार सरकार होने के नाते अपना फर्ज़ समझती है। यूं सरकार के इतने फर्ज बनते हैं कि अगर उनकी सूची बनानी पड़े तो अलग से एक मंत्रालय और मंत्री बनाकर किसी विस्थापित नेता को स्थापित किया जा सकता है। बहरहाल, वर्तमान मुद्दा है विकास दर को सुधारना और हमें भरोसा है सरकार इसे सुधार कर ही दम लेगी।
विकास दर को लेकर सरकार जो भी सोचे, सोचती रहे, लेकिन हमारे देश के लोग कुछ और ही सोचते हैं।सभी यही सोचते हैं कि देश बनता है व्यक्ति से और व्यक्तियों से, इसलिए सबसे पहले व्यक्ति का विकास होना चाहिए। सरकार अच्छी तरह जानती है कि ऊंचे ऊंचे पदों पर बैठे मंत्री से लेकर अफसर तक और यहां तक कि निचले स्तर पर संतरी तक व्यक्ति अपने-अपने विकास में मुस्तैदी से जुटे हुए हैं। देश का मीडिया अगर जागरूक ना होता तो यह पता ही नहीं चल पाता कि कौन कितना तेजी से अपनी विकास दर को मजबूत बना रहा है।
हमारे मंत्री टू-जी, स्पेक्ट्रम,संचार,खेल,कोयला,रक्षा मामले में कारनामे दिखाकर अपनी विकास दर बढ़ा लेते हैं।हमारे खिलाड़ी मैच फिक्सिंग से अपनी विकास दर को मजबूत बना लेते हैं। ऐसे में हमारे अफसर क्यों पीछे रहें! एक अफसर जिसका मासिक वेतन इतना होता है कि घर-गृहस्थी,बच्चों की पढ़ाई,सफ़ेद कालर की धुलाई का खर्च आसानी से चल जाए किन्तु देखते ही देखते करोड़ों-अरबों में खेलने लगता है।पद चाहे इंजीनियर,वन अधिकारी, पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी आदि कुछ भी हो सकता है। जनता के विकास की ज़िम्मेदारी निभातेनिभाते वे अपने विकास की चिंता में इतने  डूब जाते हैं कि उनकी  विकास दर सौ गुना, हजार गुना,दस हजार गुना बढ़ा जाती है और सरकार की विकास दर का कांटा 5 से 6 प्रतिशत पर आकर अटक जाता है। देश खूब अच्छी तरह जानता है कि हमारे कई महान संतगण भी इस विकास कला में इतना आगे बढ़ गए हैं कि सेंसेक्स की उछाल भी बेचारी शर्म से जमीन में गड़ी जाती है।
इसलिए हम तो कहते हैं भाड़ में जाए देश की विकास दर । सरकार को तो विकास दर की चिंता बिलकुल छोड़ देनी चाहिए,क्योंकि आज तक जो भी सरकारें रहीं वे भी देश की विकास दर नहीं सुधार सकीं तो इस दु:ख में दुबले होने का क्या मतलब क्या है।व्यक्ति की विकास दर सुधरेगी तो समूहों की भी सुधरेगी और इस तरह एक दिन पूरे देश की विकास दर अपने-आप सुधर जाएगी।हम सुधरेंगे तो देश अपने आप सुधर जाएगा ना। -फारूक आफरीदी 
 @रचना मौलिक और अप्रकाशित है।

फारूक आफरीदी, बी-70,फ़र्स्ट फ्लोर,प्रगति पथ, बजाज नगर, जयपुर-302015
email : faindia2015@gmail.com मो. 094143 35772


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें