बुधवार, 3 दिसंबर 2014

सपने साकार करने का युग



व्यंग्य

सपने साकार करने का युग

इंसान जब से पैदा हुआ तब से सपने देखता आया है, जैसे सपने देखना उसका जन्मसिद्ध अधिकार हो। हमें पता नहीं कि इंसान ने अपने तईं सपने देखने का अधिकार कब से छोड़ दिया और कब से दूसरों के सपने साकार करना शुरू कर दिया। हो सकता है लोग राजा-महाराजाओं और बादशाहों के जमाने में भी अपने सपनों की बजाय उनके सपने साकार करते रहे होंगे।  
आज हम लोकतन्त्र के युग में जी रहे हैं। सपने अभी भी देख रहे हैं। आम आदमी अपने सपने साकार करने के लिए दिन-रात यानी यूं कहें कि जिंदगी भर खटते रहते हैं लेकिन सपने हैं कि साकार होने का नाम ही नहीं लेते। दूसरी ओर हमारे लोकतन्त्र के प्रहरी अपने या आमजन के सपने साकार करने की बजाय अपने नेताजी के सपने साकार करने में लगे हैं।
इधर मंत्री पद की शपथ ली और उधर उनका नेताजी के सपने साकार करने का अभियान उछाले मारने लगता है। वे देश-प्रदेश की निष्ठापूर्वक सेवा की शपथ लेकर सीढ़ियाँ उतरते ही उनकी बाट जोह रही मीडिया टीम के सामने अपने और अपनी जनता के सारे सपनों को साकार करने का संकल्प भुलाकर विशुद्ध रूप से अपने महान नेताजी का सपना पूरा करने के लिए कमर कसते दिखाई पड़ते हैं, भले ही उनके नेताजी ने उन्हें बताया भी ना हो कि उनका सपना क्या है। है ना अजीब बात! इस चक्कर में यह भी तो हो सकता है कि उनके नेताजी का सपना कुछ और हो और वे कुछ दूसरा सपना ही साकार कर रहे हों।
यह भी संभव है कि हमारे लोकतन्त्र के प्रहरी अपने नेताजी के सपनों की बजाय अपने और अपने परिवार, रिश्ते-नातेदारों के वे सपने साकार कर रहे हों, जो वर्षों से देख रहे हों। हमारे अनुमान गलत साबित हो सकते और सही भी । असल में उनके सपनों के साकार रूप का पता तो तभी चल पाता है जब वे सपनों की नई पोटली के साथ फिर से लंबे-लंबे हाथ जोड़ते दिखाई पड़ते हैं। -फारूक आफरीदी

@रचना मौलिक और अप्रकाशित है।

फारूक आफरीदी, बी-70, फ़र्स्ट फ्लोर,प्रगति पथ, बजाज नगर,जयपुर-302015 email : faindia2015@gmail.com मो. 94143 35772

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें